धर्म की लड़ाई

ना हिंदू खतरे में है, ना मूसलमां खतरे में है,
हां मगर तुम्हारे अंदर का इंसान खतरे में है।
धर्म का मुखौटा पहन तुम इंसानियत का खून कर रहे हो,

बताते हो खुद को खुदा की औलाद और उसके ही बन्दों से लड़ रहे हो।
क्या करोगे ऐसे मंदिर का ही जिसकी दिवारों पे मासूमों के लहू के छिंटे होंगे,
कैसे उठाओगे वो हाथ इबादत में जिसने लाखों घर लुटे होंगे।
अब तुम्हें अपराधियों में भी हिंदू मूसलमां नजर आता है,
मुझे तो अब उनसे ज्यादा तुम्हारी आंखों में हैवान दिख जाता है।
मत मानो इस बात को, जाओ बचाओ अपनी जात को।
इश्वर अल्लाह एक हैं तुमने कभी नहीं माना,

अरे तुमने तो लाल, हरे को भी धर्मों से पहचाना।

पर नरक जहनूम एक है ये कैसे झूठलाओगे,

जब एक दूसरे की जान ले खुद को एक ही जगह पाओगे।
जब एक दूसरे की जान ले खुद को एक ही जगह पाओगे।

20 thoughts on “धर्म की लड़ाई

  1. Reblogged this on The Shubham Stories and commented:
    ना हिंदू खतरे में है, ना मूसलमां खतरे में है,
    हां मगर तुम्हारे अंदर का इंसान खतरे में है।

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